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बसंत
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नव कालिका ,नव पल्लव
नवजीवन का आह्वान
कानन कुंजन में कलरव
गूँजे नवल विहान ।
सरसों फूली,  झूली अमुआ 
टेसू अमलतास लहराए
महमह मदमाती महुआ
दावानल सा भरमाए ।
जड़ – चेतन में तरुणाई
प्रकृति संग आई
देख साँझ की अरुणाई
पवन चली बौराई ।
रंग बसंती , रूप बसंती
झूमकर आया वसंत
मन गिरह खोल सुमति
भर गया ऋतु महंत ।
समाहित कर अक्षय उल्लास
चलीं  नदियां ताल सरवर
बसंत की आभा औ विभास
धरा पर गगन पर  मनहर ।

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बड़ी करिश्माई है अहसासे मुहब्बत
जीवन नहीं कभी बंज़र होता है।

संग मौसम उतर जाओ फ़िज़ाओं में
तुमसे ही शादाब मेरा शज़र होता है।

रात कट जाती है आँखों में अक्सर
उधर भी क्या यही मंज़र होता है।

अजाबे इश्क़ भी अज़ीज़ होता है ,पास
जब तुम्हारी बांहों का पिंजर होता है।

दिल की बात आती नहीं जुबां पे
दिल पे चलता तब खंज़र होता है। 

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हँसना सीखा दिया रोना सीखा दिया
प्यार ने तेरे ख्वाबों में जीना सीखा दिया।
बाद मुद्दत के ऐसा कोई शख्स मिला
पत्थर को पिघलना सीखा दिया।
गमो खुशी में तलाशते हैं वही कांधा जिसने
करवटों में शब बीताना सीखा दिया।
दिलाज़ार की गुस्ताखी कैसे भूले कोई
आग में जो बेखौफ़ कूदना सीखा दिया।
कोरी थी जीवन की किताब यह
प्यार ने उसके रंग भरना सीखा दिया।

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बना दो या बिगाड़ दो आशियाँ दिल का
हाथ में ये तेरे है ,नहीं काम कुदरत का।

तोड़ दो यह ख़ामोशी ,खफ़गी भी अब
सर ले लिया अपने, इल्ज़ाम मुहब्बत का।

जी करता है बिखर जाऊं खुशबू बन
तोड़ कर बंदिशें तेरी यादों के गिरफ्त का।

बज़्मे जहान में कोई और नहीं  जंचता
कुर्बत में तेरे जवाब है हर तोहमत का।

उम्मीदों का दीया जलता है मुसलसल
कभी तो बरसेगा मेघ उसकी रहमत का।...copyright k.v.  

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बरस - बरस घन बरसाओ  रे
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बरस - बरस घन बरसाओ  रे
हरस - हरस मन हरसाओ रे।
           शप्त पतझड़ में मधुवन
            आँखन में  है असवन
            सूना - सूना है चितवन
             नद- पोखर ,वन - उपवन
उठ रहा मेघों का ज्वार  आज
नयन और गगन हुए  एक आज
यादों से न तन को तरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे।
                           कैसे बतलाऊँ प्रेम की पीर
                          निशि दिन रहता मन अधीर
                              पलक बिछाऊँ यमुना के तीर
                                  इस सावन आएगा मेरा हीर
 हर वन - प्रांतर का उत्ताप आज
हर मन - आँगन का संताप आज
सरस पावस धन दरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे।
                              ओढ़ कर चुनरिया धानी
                                इठला रही वसुधा रानी
                                 न करना मेघ मनमानी
                                  तुमसे बड़ा न कोई दानी
 बरसा अमृत कण - कण सरसाओ रे

बरस - बरस घन बरसाओ रे। 
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सडकों में नपती हैं शहरों की दूरियां 
दिल के रिश्तों में कहाँ कमती दूरियां 

अहसासों को  बाँध लेते गर सीमाओं में 
फिर कहाँ सालती हमारे  बीच की दूरियां 

टूट जाता है सब्र का सैलाब कभी- कभी 
बारिशों  में जब जिय जलाती हैं दूरियां 

पहले तो पंछी भी पहुंचाते थे सन्देश
अब कहाँ रहे पंछी कि तय करें दूरियां

सीने में आग लेकर भी जी रहे मुकम्मल
इस  आग को और हवा देती हैं दूरियां...copyright kv

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अनचाहा मिल जाता है
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एक याद आती है सहसा 
हृदय सुमन खिल जाता है 
जिसकी चाह ,नहीं मिलता वह 
अनचाहा मिल जाता है। 

हो नज़रों से दूर भले तुम 
मन में पर तुम ही तुम हो 
सिर्फ साथ रहने भर से ही 
उधड़ा मन सिल जाता है। 

हर एक दुआ हो गर कुबूल 
जीवन नहीं पहेली होगा 
उदासियों के मंज़र पर भी 
मन अक्सर हिल जाता है। 

पेंचोखम में उलझ - उलझ  कर 
बहुत बेरहम हुई उम्र यह 
एक तुम्हारे आने भर से 
हृदय कलुष धुल जाता है। 

खुश हूँ जब से ठानी मैंने 
हर हालत में खुश रहना है 
सजदे करती हूँ मंदिर में 
मेरा मन छल जाता है। 

क़ैद आज भी आँखों में है 
तुमसे मिलने के वो सपने 
निकट तुम्हारे आना चाहूँ 
मेरा पाँव फिसल जाता है। 

कोई शिकवा नहीं किसी से 
नहीं इल्तज़ा अरी ज़िन्दगी 
मेरा तो यादों भर से ही 
सारा काम निकल जाता है।  

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