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उसूलों की लड़ाई
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परिवेश का प्रभाव
आधुनिक सोच के तीखे तेवर
सब कुछ हावी हो जाता है
पुरातनपंथी कहलाने वाले
तथाकथित माता - पिता पर
वयस्क होते बच्चों के अपने पैमाने
अपनी जटिल लीक पर चलते हुए
हमारे निर्दिष्ट उसूलों पर
अक्सर आघात करते हैं
तब हमें अपनी ही कार्यशैली
चिढ़ाती हुई सी प्रतीत होती है।
 जिसे हम पीढ़ियों का अंतर कहते हैं
वह बड़ी सहजता  से
हमारे पैदाइशी मौलिकता को
निगल लेते हैं
और हम किंकर्तव्यविमूढ़ सा
अपने ताने - बाने में विचरते
मौन हो जाते है।
हमारा मौन होना हमारी स्वीकृति नहीं
आत्मसमर्पण भी  नहीं ,बस
आत्ममंथन है
लेने - देने की प्रक्रिया पर।

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