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बरस - बरस घन बरसाओ  रे
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बरस - बरस घन बरसाओ  रे
हरस - हरस मन हरसाओ रे।
 शप्त पतझड़ में मधुवन
 आँखन में  है असवन
 सूना - सूना है चितवन
 नद- पोखर ,वन - उपवन
उठ रहा मेघों का ज्वार  आज
नयन और गगन हुए  एक आज
यादों से न तन को तरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे
 कैसे बतलाऊँ प्रेम की पीर
 निशि दिन रहता मन अधीर
  पलक बिछाऊँ यमुना के तीर
   इस सावन आएगा मेरा हीर
 हर वन - प्रांतर का उत्ताप आज
हर मन - आँगन का संताप आज
सरस पावस धन दरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे
 ओढ़ कर चुनरिया धानी
  इठला रही वसुधा रानी
   न करना मेघ मनमानी
 तुमसे बड़ा न कोई दानी
बरसा अमृत कण - कण सरसाओ रे
बरस - बरस घन बरसाओ रे। 

K P Anmol  – (12 July 2016 at 23:53)  

बहुत सुंदर गीति काव्य

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