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आदमखोर
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उन दिनों जब नील नदी के किनारे
मिस्र की सभ्यता उजड़ रही थी
भूख से बिलबिलाता मनुष्य
बीहड़ वन से गुजरते हुए 
मनुष्य का ही शिकार कर
अपनी क्षुद्धा की तृप्ति करता था।
आदमखोर अब भी हैं
उनकी बस नीयत बदल गयी है
खाने को पर्याप्त चीज़ें हैं अब
इसलिए वे मात्र उन माँसल
अंगों में दांत गड़ा कर
और पंजों से नोच
क्षत - विक्षत छोड़ देते हैं क्योंकि
वे आदमखोर नहीं हैं। 

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बसंत
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नव कालिका ,नव पल्लव
नवजीवन का आह्वान
कानन कुंजन में कलरव
गूँजे नवल विहान ।
सरसों फूली,  झूली अमुआ 
टेसू अमलतास लहराए
महमह मदमाती महुआ
दावानल सा भरमाए ।
जड़ – चेतन में तरुणाई
प्रकृति संग आई
देख साँझ की अरुणाई
पवन चली बौराई ।
रंग बसंती , रूप बसंती
झूमकर आया वसंत
मन गिरह खोल सुमति
भर गया ऋतु महंत ।
समाहित कर अक्षय उल्लास
चलीं  नदियां ताल सरवर
बसंत की आभा औ विभास
धरा पर गगन पर  मनहर ।

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